फागुन में प्रेम की होरी
गोपाल कृष्ण व्यास
मधुमास की मृदुल बेला में,
मंद-मंद मुस्काए फागुन।
चंपा-चमेली की सुरभि संग,
प्रेमिल पवन सुनाए गुनगुन॥
कुंज-कुंज में कोकिल बोले,
मधुप करे रस-गान।
नयनों में नव स्वप्न सजाए,
धड़के चंचल प्राण ॥
सखियों संग सजी-संवरी,
लाज झुकी श्यामल काया।
रंग-भरी पिचकारी लेकर,
श्याम ने चितवन बरसाया ॥
कृष्ण की चपल अदा पर,
मुस्काई व्रज की रानी राधा।
गुलाल-रंजित अधरों पर जैसे,
खिल उठी अरुणिम आभा॥
वृन्दावन के निकुंजों में फिर,
रचती मधुरिमा की लीला।
कदंब तले लजवंती बनकर
श्यामल रंग में भीगी राधा॥
अधरों की लालिम आभा,
पीताम्बर-सी स्वर्णिम छटा।
हरित चुनर इंद्रधनुष उतरे,
सज उठती अनुराग-घटा l॥
गोकुल बरसाना की गलियां,
हुई स्नेह-प्रेम से सिंचित।
अबीर उड़ाए प्रेम का रसिया
रंगों में हर तन-मन रंजित॥
स्पर्श हुआ रंग-भरे कर का,
सिहर उठे कोमल अंग।
नयनों की भाषा कह गई,
मन में छिपा मधुर अनंग ॥
ढोल-मृदंग की मादक थापें,
हृदय-वीणा को झंकृत करतीं।
रति-रस की लहरियां रेशमी
आत्मा की सुधि को भरतीं ॥
होली केवल रंग न होती,
यह मिलन-राग की बेला है।
जहां प्रीत पिघलकर बहती,
वो प्रेम की स्वयं मधु-मेला है ॥
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