दिसम्बर...

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दिसम्बर...






दिसम्बर
पवन सैन 'मासूम'

वर्ष जो चलते चलते थक गया है, 
सुस्ता रहा है, 
अपनी अन्तिम संतान की बांहों
की परिधि भीतर।

दिसम्बर की चर्म अट चुकी है
ग्यारह माह की लंबी यात्रा के
उभर आए चिह्नों से, 
अनुभव के आलेख
किसी अज्ञात लिपि में
उसके बदन में आ लिपटे हैं

अन्तिम माह के अन्तिम दिनों में
थके-हारे महाराज की भांति
बैठा व्यक्ति करता है मंत्रणा
स्वयं को स्वयं के सम्मुख रख।

पाए को सोचता है, 
हंसता है थोड़ा;
दोगुना रोता है, 
खोए को सोचकर।
वह जो हासिल करना था, 
न कर सका;
छटपटाता है
उस आकांक्षा को ओक से 
रेत की भांति फिसलता देख।

कोसता है माह को
कि क्यों चले आए इतना शीघ्र, 
गिड़गिड़ाता है
कि रुके कुछ और दिन, 
क्रोधित होकर पूछता है
कि जाने के लिए क्यों आते हो? 

मैं यहीं हूं, 
समय की दीवार पर
कील की भांति गड़ा हुआ, 
तुम बढ़ रहे हो... बढ़ो! 
तुम्हारी राह पर फिर आएगा
एक दिसम्बर, 
किन्तु नहीं होऊंगा मैं वह
(कहना चाहता है दिसम्बर) 

मगर... आंखों में धुंध को लपेटे
ठिठुरते हृदय से देता है वह
जनवरी की दिलासा, 
कांपते होठों से 
करता है वायदा
कि लौटूंगा
लौटूंगा फिर एक रोज
तुम्हें थोड़ा और परिपक्व बनाने।


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